•Saturday, December 05, 2009
अपना मोबाइल नंबर बदले बिना मर्जी का ऑपरेटर चुनने के लिए आपको सिर्फ 19 रुपये देने होंगे। मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) की यह सुविधा 31 दिसंबर से मेट्रो और कैटिगरी 'ए' के सर्विस क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को मिलने लगेगी। देश के अन्य सभी हिस्सों में 20 मार्च 2010 से यह सुविधा उपलब्ध होगी।
एमएनपी के तहत आप चाहें तो दूसरी टेक्नॉलजी का सर्विस प्रोवाइडर चुनें या फिर अपने ही सर्विस प्रोवाइडर की दूसरी टेक्नॉलजी चुनें। ट्राई के सलाहकार सुधीर गुप्ता ने एनबीटी को बताया कि कोई भी उपभोक्ता अपने मौजूदा सर्विस प्रोवाइडर को बदलना चाहता है तो उसे अपनी पसंद के नए सर्विस ऑपरेटर के पास आवेदन करना होगा। नए सर्विस प्रोवाइडर को उपभोक्ता का आवेदन प्राप्त होने के बाद चार दिन के अंदर पोर्टिंग प्रोसेस पूरी करनी होगी। जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के लिए इस प्रक्रिया को पूरा करने की समय सीमा 12 दिन रखी गई है।
सर्विस प्रोवाइडर की इच्छा पर है कि वह सेवाएं देने की एवज में 19 रुपये से कम शुल्क ले या फिर कुछ न ले। स्वस्थ प्रतियोगी बाजार को ध्यान में रखते हुए टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) ने यह फैसला मोबाइल सर्विस ऑपरेटरों पर छोड़ दिया है। मतलब यह कि आप अपना मौजूदा मोबाइल नंबर रखते हुए केवल 19 रुपये में देश के किसी भी सर्विस प्रोवाइडर की सेवाएं ले सकते हैं। इस व्यवस्था की एक खास बात यह है कि 19 रुपये का शुल्क अधिकतम शुल्क है।
एमएनपी रेग्युलेशन्स के तहत उपभोक्ता को किसी सर्विस प्रोवाइडर से मोबाइल नंबर लेने के 90 दिन के बाद अपना सर्विस प्रोवाइडर बदलने की छूट होगी। उसे वापस अपने पूर्व मोबाइल ऑपरेटर के पास जाने की भी छूट होगी। इसके लिए भी 90 दिन की समय सीमा तय की गई है। वह अपने नंबर के पोर्टिंग आवेदन को 24 घंटे के अंदर वापस भी ले सकता है। ऐसी स्थिति में लिया गया पोर्टिंग शुल्क लौटाया नहीं जाएगा। उपभोक्ता को किसी दूसरे ऑपरेटर के पास अपना नंबर पोर्ट करने की सुविधा लेने के लिए मौजूदा सर्विस प्रोवाइडर के बिलों के पूरे भुगतान को लेकर अंडरटेकिंग देनी होगी।
मौजूदा व्यवस्था के तहत कस्टमर को अपना मौजूदा नंबर रखते हुए नया ऑपरेटर चुनने की सुविधा नहीं हैं। यदि कोई अपने मौजूदा मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर से खुश नहीं है और उसे छोड़ कर किसी दूसरे मोबाइल ऑपरेटर की सेवा लेना चाहता है तो उसे अपना मौजूदा नम्बर भी छोड़ना पड़ता है।
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•Monday, November 30, 2009
आशीष पांडे
नई दिल्ली।। इस लहर का हल्ला बहुत है, लेकिन इसके रोमांच को महसूस करने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना पड़ा।
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हम बात कर रहे हैं गूगल के नए प्लैटफॉर्म वेव की, जिसमें काम और कम्यूनिकेशन (यानी ई-मेल, चैट, सोशल नेटवर्किंग और डॉक्युमेंट) जैसी तमाम सर्विसेज को एक प्लैटफॉर्म में समेट दिया गया है। गूगल ने दुनिया भर में करीब 10 लाख लोगों को इसके ट्रायल के लिए इनवाइट किया है। कई दिन पहले गूगल में रजिस्टर करने के बाद आखिरकार इसी हफ्ते मुझे गूगल वेव का इनविटेशन मिल ही गया (जरा याद कीजिए, जब जी-मेल पहले पहल आई थी, तो उसमें भी इनविटेशन का कुछ ऐसा ही फंडा था)। गूगल वेव का फंडा आखिर क्या है, आपको बताने के लिए हमने गूगल वेव को टेस्ट किया और इसके बारे में और भी मजेदार जानकारियां जुटाईं।
क्या है गूगल वेव
कुछ लोगों को लगता है कि गूगल की नई लहर यानी वेव कुछ समय के अंदर ई-मेल का इस्तेमाल ही बंद कर देगी, क्योंकि हम हर वक्त वेव से कनेक्ट रहेंगे। कई लोगों की राय है कि ई-मेल बनी रहेगी, हमारे काम करने का अंदाज बदल जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि वेव में आखिर इतना दम है कि वह हमारी कंप्यूटिंग हैबिट को ही बदल सके। वेव में आप कई लोगों के साथ एक साथ कम्युनिकेट करते हैं। कुछ इस तरह समझिए, ई-मेल जब ईजाद की गई थी, तब इंटरनेट ही नहीं, मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग तो दूर की बात थी। गूगल ने सोचा कि ई-मेल अगर आज की तारीख में ईजाद की गई, तो कैसी होती, कुछ ऐसी जो आपकी सोशल नेटवर्किंग , इंटरनेट सर्फिंग और चैटिंग जैसे कम्यूनिकेशन से जुड़ी होती। वेव कुछ इसी जरूरत को पूरा करता है।
कैसे काम करता है वेव
वेव से जुड़ने के बाद आप इसमें गूगल की आईडी से लॉग-इन करते हैं। पेज में लेफ्ट साइड पर आपको नेविगेशन टूल और कॉन्ट्रैक्ट लिस्ट दिखेगी। इसमें आपकी जीमेल लिस्ट के जो भी लोग वेव इस्तेमाल कर रहे हैं, आपको नजर आएंगे। अगर आपके दोस्त इसमें नहीं हैं, तो आप उन्हें इनवाइट भेज कर कनेक्ट कर सकते हैं। बीच के पैनल में एक आइकन होगा न्यू वेव। इस पर क्लिक करेंगे, तो स्क्रीन पर राइट साइड में नई विंडो खुलेगी, जो नया डायलॉग शुरू करने वाली वेव विंडो है। यहां पर आप कॉन्टैक्ट लिस्ट से किसी भी दोस्त के नाम को ड्रैग करके ला सकते हैं और उसके साथ कम्युनिकेट कर सकते हैं। चाहें तो और भी दोस्तों को इस बातचीत में शामिल कर सकते हैं। खास बात यह है कि जब आप अपना मेसेज टाइप कर रहे हैं, तो इस बातचीत में शामिल सभी को वह लाइव टाइप होता हुआ दिखेगा। यह रियल टाइम फीचर ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।
इसी तरह आप पिक्चर्स ड्रैग करके जैसे ही इस वेव में डालेंगे, वे सभी के बॉक्स में नजर आने लगेंगी। इसके अलावा आप इसमें साथियों के ब्लॉग, ऑरकुट अकाउंट, गूगल डॉक्युमेंट जैसे फीचर भी कनेक्ट करके एक साथ काम कर सकते हैं। प्राइवेसी का भी इंतजाम है, चाहें तो किसी को आप प्राइवेट मेसेज भी दे सकते हैं। एक और खास फीचर है प्ले बैक, इसके तहत चैट और ई-मेल के मिक्स में हो रही बातचीत को कभी भी रिवाइंड करके देखा जा सकता है। इसे आप जितना ज्यादा इस्तेमाल करते जाएंगे, आपकी वेव विंडो उतनी ही एनरिच होगी।
क्या है प्रॉब्लम
पहली नजर में देखें तो यह आपको थोड़ा जटिल लगेगा, लेकिन इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह अनुभव मजेदार होता चला जाएगा। अभी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही है कि इनवाइट करके ही आप लोगों को जोड़ सकते हैं, यानी सभी इससे कनेक्ट नहीं हैं। और आपके साथ के सभी लोग इसे यूज नहीं कर रहे हैं तो गूगल वेव इस्तेमाल करते हुए आपको मजा आएगा ही नहीं। इसके अलावा इसमें ई-मेल और गूगल टॉक में कुछ नया आने पर अलर्ट का सिस्टम नहीं है, जो थोड़ा अटपटा लगता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें अपनी गोपनीय बातें शेयर न करें, क्योंकि आपने अगर पर्सनल मेसेज नहीं किया है, तो वेव कनवरजेशन में शामिल सभी लोग इसे एक साथ देख लेंगे, कई बार यह अजीब हालात पैदा कर सकता है। जब वेव को इस्तेमाल किया तो इंटरनेट एक्सप्लोरर पर इसे लोड करने में प्रॉब्लम आई, गूगल क्रोम या मोजिला फायरफॉक्स पर वेव ढंग से एक्टिव रहा। रीयल टाइम एक्सपीरियंस के लिए सभी के पास हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्शन जरूरी है। लेकिन जानकारों का कहना है कि इतनी जल्दी आलोचना अभी ठीक नहीं है, क्योंकि अभी तो प्रीव्यू स्टेज ही चल रही है। यूज बढ़ने के साथ इसका रीयल मजा मिलेगा। |
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•Saturday, November 28, 2009
इंटरनेट की दुनिया में जब भी किसी नए वायरस का अटैक होता है, एंटी वायरस सॉफ्टवेयर शुरू से उन्हें रोक पाने में असरदार नहीं होते।
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पर अब ब्रिटिश इंजीनियरों ने इसका भी हल निकाल लिया है। वायरस से लड़ने का यह नया तरीका क्या है, आइए जानें :
ट्रैक में पकड़ लिया जाएगा वायरस
वोरसेस्टशायर की डिफेंस टेक्नॉलजी कंपनी किनेटिक के इंजीनियरों सिमोन वाइसमैन और रिचर्ड ओक ने ट्रैक में ही वायरस को पकड़ने का रास्ता निकाला है। इसमें हर उस फाइल को इंटरसेप्ट किया जाता है जिसमें वायरस छिपा हो सकता है। साथ ही उसमें कंप्यूटर कोड की स्ट्रिंग जोड़े जाने से फाइल में छिपा कोई भी वायरस नाकाम किया जा सकता है।
नए-पुराने सभी का ढूंढेगा हल
यह तकनीक मुख्यतौर पर ई-मेल के साथ आने वाले अटैचमेंट को टारगेट पर रखकर बनाई गई है। किसी भी मेल सर्वर से गुजरने के दौरान इसमें अटैचमेंट के साथ एक्स्ट्रा कोड जोड़ दिया जाता है। न्यू साइंटिस्ट जर्नल के मुताबिक, इसका सबसे तगड़ा फीचर यह है कि इसमें वायरस की किसी जानकारी की जरूरत नहीं होती इसलिए यह पुरानों के अलावा किसी नए और अपरिचित वायरस से भी निपट लेता है।
वायरस की चालाकी का तोड़
इस समय कई मेलसर्वर एग्जीक्यूट होने वाली फाइलों को अपने आप ब्लॉक कर लेते हैं क्योंकि उनसे पीसी में वायरस फैलने का डर रहता है। पर वायरस बनाने वाले इससे बचने के लिए वायरस को माइक्रोसॉफ्ट वर्ड या एडोब अक्रोबैट के तौर पर दिखाते हैं। बाद में यही फाइलें फाइल बनकर कंप्यूटर में एग्जेक्यूटर होकर वायरस अटैक कर देती हैं। किनेटिक का मकसद ऐसे वायरस को रोकना है। इसके लिए आने वाली फाइलों के हेडर एरिया में मशीन कोड डाल देता है जिसे माइक्रो प्रोसेसर चिप्स भी समझ लेती हैं।
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मूल प्रति के लिये
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•Saturday, November 28, 2009
यूसुफ किरमानी
बकरीद अपने आप में बहुत अनूठा त्योहार है। हालांकि इस्लाम धर्म के बारे में ज्यादा न जानने वालों के लिए यह किसी हलाल जानवर को कुर्बानी देने के नाम पर जाना जाता है, लेकिन बकरीद सिर्फ कुर्बानी का त्योहार नहीं है। यह एक पूरा दर्शन है, जिसके माध्यम से इस्लाम ने हर इंसान को उच्चतम त्याग की सीख देने की कोशिश की है।
इस्लाम ने जिन त्योहारों को अपनी संस्कृति का हिस्सा बनाया है, उनमें इंसान के लिए बेहद खूबसूरत पैगाम हैं। अल्लाह ने हजरत इब्राहीम से उनकी सबसे प्यारी चीज कुरबान करने की बात कही थी, इब्राहीम ने काफी मनन-चिंतन के बाद अपने बेटे की कुरबानी का फैसला किया था। वह चाहते तो किसी जानवर की कुरबानी कर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लेते। पर, उन्होंने वही किया जो सच था।
हजरत इब्राहीम की उस कुर्बानी में जो संदेश छिपा है, उसे समझने की जरूरत है। संदेश यह है कि इंसान पर अगर कभी ऐसी परीक्षा आन पड़े, तो उसे हर कुर्बानी के लिए तैयार रहना चाहिए, उस समय उसके कदम लड़खड़ाएं नहीं। कुर्बानी की यह परीक्षा ईश्वर आपसे कहीं भी ले सकता है, चाहे वह परिवार के लिए हो, समाज के लिए हो, अपने देश के लिए हो या फिर किसी गैर के लिए ही क्यों न हो।
कुछ लोग जिंदा रहते अपने अंग दान करने के लिए (मृत्यु के बाद) कह जाते हैं, उसके पीछे भी कुछ इसी तरह की भावना होती है। कुछ जीवन में ही स्वेच्छा से अपना खून या एक किडनी या लीवर दान दे देते हैं। चाहे ऐसा वह अपने किसी प्रिय जन के लिए भी करता हो, लेकिन अपने आंख, पैर, हाथ लेकर सीधे स्वर्गलोक में जाने की कल्पना करने वाला आम इंसान इतनी सी कुर्बानी के लिए भी कहां तैयार होता है।
कुर्बानी की एक और व्याख्या है, जो वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह फिट बैठती है। पूछा जाता है कि हम आम लोग पैगंबर तो नहीं हैं, फिर हम लोग किन चीजों की कुरबानी दे सकते हैं? हम अपने अहंकार की कुर्बानी दे सकते हैं। इगो आज की सबसे बड़ी समस्या है। अगर हर इंसान सिर्फ अपने अहम की कुरबानी दे दे तो हम एक ऐसी सोसायटी का निर्माण कर सकते हैं जो बेमिसाल होगी।
अगर लोग इस बकरीद पर इस अहम को ही त्यागने का फैसला कर लें, तो इस त्योहार का मकसद पूरा हो जाएगा। हालांकि यह बात कुछ लोगों के गले नहीं उतरेगी, लेकिन आज समाज हमसे हमारे अहम की कुरबानी मांग रहा है।
बकरीद पर इस्लाम ने कुरबानी के जो नियम बनाए हैं, उसके साथ कुछ शर्तें भी हैं। उन शर्तों में भी एक बड़ा संदेश छिपा है। कहा गया है कि जानवर की कुर्बानी के बाद उसके तीन हिस्से किए जाएं। एक हिस्सा खुद के लिए रखा जाए और बाकी दो हिस्से तुरंत समाज में जरूरतमंद लोगों के बीच बांट दिया जाए। जिस तरह ईद में भी खैरात-जकात के जरिए समाज के गरीब तबके की मदद के लिए कहा गया है, ठीक उसी तरह की व्यवस्था बकरीद में भी लागू है। यह कोई परंपरा नहीं है, जिसका त्यौहार में पालन किया जाना जरूरी है, यह दस्तावेजी सबूत है, जिसमें साफ तौर पर इस्लाम की फिलासफी छिपी है।
इस्लाम की बुनियाद जिन वजहों से रखी गई थी, यह दोनों त्योहार उसकी अहम कड़ी हैं। लेकिन, यह सारी बात उसी बात में आकर मिलती है कि किसी के लिए या समाज के अन्य तबके के लिए कुछ करने से पहले हमें खुद में कुरबानी का जज्बा लाना पड़ेगा, कुछ त्यागना पड़ेगा, अपने अहंकार को ताक पर रखना होगा। हम लोग बातें चाहे जितनी भी लंबी-चौड़ी कर लें, लेकिन हम कुछ भी त्यागने को तैयार नहीं हैं। न अपना ईगो और न अपनी सोच।
कुर्बानी एक दर्शन है, यह आप पर है कि आप उसे किस तरह करते हैं। आप मुसलमान हों या गैर मुसलमान, आप के भीतर त्याग का वह जज्बा होना चाहिए
प्रस्तुत पोस्त किमूल प्र
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•Saturday, November 28, 2009
ब्रिटेन में वैज्ञानिकों की एक चमत्कारिक कोशिश से पिछले 30 साल से दृष्टिहीन रहे एक शख्स ने दोबारा दुनिया देखना शुरू कर दिया है
पीटर लेन दुनिया का ऐसा पहला शख्स हो गया है, जिसे ऐसी बायोनिक आंख फिट की गई है, जो कैमरा और विडियो प्रोसेसर का इस्तेमाल करता है।
मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक दुर्लभ इंप्लांट के जरिये वैज्ञानिकों ने 51 साल के व्यक्ति को 'बायोनिक आई' (मशीनी आंख) लगाकर देखने की काबिलियत लौटा दी।
चश्मे के दोनों ग्लासों पर लगाया गया यह कैमरा और विडियो प्रोसेसर कैप्चर की गई तस्वीरों को बिना किसी वायर के ही आंख के बाहर लगे एक नन्हे से रिसीवर को भेज देता है। बदले में यह रिसीवर खुद को मिले डेटा को छोटे-से केबल के जरिये रेटिना पर लगे इलेक्ट्रोडों की एक सीरीज को पास कर देता है और यह शख्स देखने में सक्षम होता है। गौरतलब है कि रेटिना विशेष तरह के सेल्स का वह लेयर है, जो प्रकाश किरणों के प्रति रिएक्ट करता है।
दरअसल, पीटर लेन मैनचेस्टर स्थित रॉयल आई हॉस्पिटल में शुरू किए गए एक विशेष प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं और इस इंटरनैशनल ट्रायल में शामिल किए गए 32 लोगों में एक हैं। ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट पाउलो स्टैनगाट को कोट करते हुए ब्रिटिश मीडिया ने कहा कि मरीजों में उससे कहीं ज्यादा तेजी से सुधार हो रहा है, जितना हमने सोचा था। हालांकि इस पर अभी बहुत काम किया जाना बाकी है, लेकिन यह निश्चित रूप से पेशंट और वैज्ञानिक समुदाय दोनों के लिए बेहद उत्साहजनक है। इस बायोनिक आई के जरिये पीटर लेन वस्तुओं की आउटलाइन को रोशनी के बिंदुओं के रूप में देख सकते हैं, जैसे- दरवाजे का फ्रेम या फर्निचर। हालांकि अभी वे पूरी वस्तु को नहीं देख सकते, लेकिन पूरी तरह दृष्टिहीन रहे लेन के लिए यह नायाब तोहफा है।
पस्तुत पोस्ट की मूल प्रति
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•Saturday, November 14, 2009
एक समय था जब मुझे अपने मोबाईल नोकिया 6600 के लिए 512 MB का मेमोरी कार्ड 1500 रुपये का मिला था
और आज एच पी की ८ जी बी की पेन ड्राइव मात्र
800 रुपये में उपलब्ध है एक साल की गारंटी के साथ, और वो भी विश्व की सबसे छोटी पेन ड्राइव
4 जी बी की यही पेन ड्राइव मात्र 350 रुपये में मिल रही है
4 जी बी की साधारण पेन ड्राइव मात्र 230 रुपये में मिल रही है
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अगर बात की जाये इन्टरनल हार्ड डिस्क की तो 2 T.B. (2048 G.B.) की हार्ड डिस्क मात्र 14000 रुपये में
1 T.B. (1024 G.B.) की हार्ड डिस्क मात्र 4000 रुपये में वो भी पॉँच साल की गारंटी के साथ
500 G.B. की हार्ड डिस्क मात्र 2300 रुपये में वो भी पॉँच साल की गारंटी के साथ
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1 T.B. (1024 G.B.) की हार्ड डिस्क मात्र 5800 रुपये में
500 G.B. की पोर्टेबल हार्ड डिस्क मात्र 3300 रुपये में वो भी पॉँच साल की गारंटी के साथ
अब आप ही बताइये इस वर्तमान का भविष्य क्या होगा ???
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प्रस्तुत पोस्ट मैंने तथ्तों और जानकारी को जोड़ कर लिखी है और किसी लिकं को कॉपी नहीं किया है इस लिए लिंक देना संभव नहीं है
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•Monday, November 09, 2009
इंटरनेट पर अंग्रेजी की बादशाहत को टक्कर देने की तैयारी है। अब आप डोमेन नेम या अड्रेस को अंग्रेजी के अलावा किसी और भाषा में भी लिख सकेंगे। 'द इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स ऐंड नंबर्स' (आईकैन) नाम का संगठन इंटरनेट में चार दशक के इस सबसे बड़े बदलाव को इसी हफ्ते मंजूरी दे सकता है।
यही संगठन डोमेन नेम की निगरानी करता है, जिसकी इसी हफ्ते यहां बैठक होने जा रही है। हर वेबसाइट, ईमेल अड्रेस या किसी ब्लॉग पोस्ट के आखिर में 'डॉट कॉम' या इसी की तरह आखिर में आने वाला सफिक्स या उपनाम डोमेन कहलाता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को होगा जो अपनी वेबसाइट को मनपसंद नाम देना चाहते हैं। सिर्फ अंग्रेजी में डोमेन नेम की व्यवस्था होने की वजह से नाम चुनने के ऑप्शन लिमिटेड होते थे, लेकिन अब अंग्रेजी के अलावा बाकी भाषाओं में भी यही सुविधा उपलब्ध होने पर हमारे पास अनगिनत ऑप्शन होंगे।
आईकैन की इस बैठक में इस बात पर विचार किया जाना है कि क्या इंटरनेट अड्रेस को लैटिन लेटर्स के बजाय स्क्रिप्ट में लिखा जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो इंटरनेट अड्रेस को अरबी, कोरियाई, जापानी, ग्रीक, हिंदी और सिरिलिक (रूसी) में भी लिखा जा सकता है। आईकैन बोर्ड के चेयरमैन पीटर डेंगाटे ने इसे इंटरनेट के लिए फैंटेस्टिक कॉम्प्लिकेटेड टेक्निकल फीचर बताया है। इंटरनेट की शुरुआत 1969 में अमेरिकी यूनिवर्सिटी में हुई, लेकिन 1990 के बाद दुनियाभर में इसका इस्तेमाल बिजली की तेजी से बढ़ा।
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